Thursday, May 12, 2016

नींद नहीं आती...न जाने कहाँ रूठ कर चली गई है.

नींद नहीं आती.
न जाने कहाँ रूठ कर चली गई है.

करवटें भी कब-की उबासियाँ लेते-लेते सो गईं
चारपाई तो मौन व्रत लिए बैठी है
बट्री ख़तम होते ही फ़ोन ने बजना बंद कर दिया
(वैसे भी आजकल कम ही बजता है)
मित्तल जी के कुत्ते का भौंकना पता भी नहीं चलता
जाती हुई ठण्ड चद्दर के बाहर ही रहती है
मेरे पैर हिलाने की आदत जो तुमने छुड़वा दी थी...

सोने ने पहले मूँह धो लेता हूँ
डॉक्टर की दी दवाई भी OK-type है
सर में दर्द अब नहीं रहता
रात भर गाने सुन-सुन का ऊब चूका हूँ
सुबह जल्दी उठकर कूड़ा खुद ही फेंकने जाता हूँ
इतना कुछ करता हूँ दिन भर
पता नहीं फिर क्यूँ आजकल

नींद नहीं आती.
न जाने कहाँ रूठ कर चली गई है.

कहीं तुम्हारे पास तो नहीं?
अरे ज़रा चेक तो करना प्लीज़...
कहीं तुम्हारे तकियों ने नीचे मेरे TV का रिमोट ढूंढ रही हो?
या कहीं तुम्हारे बिस्तर पर फैलीं दसियों किताबों में से किसी एक किताब के दो पन्नों के बीच बुकमार्क बनी बैठी हो?
हो सकता है तुम्हारे मकान में हमारा घर ढूंढ रही हो.
या शायद मेरे हाथ की चाय उसे अच्छी नहीं लगती.
तुम्हारे तरह सफाई पसंद भी है.
अरे वो मिले तो कहना ASAP बुलाया है मैंने
अब पलकों का वज़न और न बढ़ाये मेरा
काफी दिन हो गए

नींद नहीं आती.
न जाने कहाँ रूठ कर चली गई है.