Thursday, May 15, 2014

"जंग-ए-आइस-क्रीम"

भारतीय शादियों में आइस-क्रीम वाले से आइस-क्रीम ले पाना भी बड़ी टैलेंट की बात है| एक स्टाल के सामने बारातियों और खैरातियों का हुजूम लगा होता है, जैसे किसी छत्ते के चारों ओर मधुमक्खियाँ चिपटी हों| दुल्हे की चाची और दुल्हन की मौसी, अपने-अपने साइड की आंटी गैंग को लीड करतीं हैं, उन्हें लाइन में लगने की ज़रूरत नहीं होती| उनकी आइस-क्रीम वाले से सीधी  सेटिंग होती है (वैसे भी लाइन होती कहाँ है?)| वहीँ कम उम्र कमसिन बालाओं को, जो कि हर शादी में घाघरा-चोली का नया जोड़ा पहनतीं हैं, कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती है| दुल्हे के भाई और भाइयों के दोस्त उनके लिए 'फ्री होम डिलीवरी सर्विस' उपलब्ध करा देते हैं| जिन बालाओं का गुरूर थोड़ा बड़ा होता है, या जो पहले से सेट होतीं हैं, उन्हें भी ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है| बस आइस-क्रीम वाले की तरफ़ मुस्कुरा कर बोलना पड़ता है, "भैय्या प्लीज़ एक सोफ्टी दे दो"| और बस, लट्टू हो चुके आइस-क्रीम वाले भैय्या सबसे पहले उन्हें ही सोफ्टी थमा देते हैं| दूल्हा-दुल्हन के चाचाओं और मामाओं को आइस-क्रीम की फ़ुर्सत नहीं होती, और वैसे भी, कहते हैं कि शराब के साथ दूध की कोई भी चीज़ खा लेने से पेट गड़बड़ हो जाता है|
अब बच जातें हैं तो बिचारे बच्चे! उनकी कोई सुनने वाला नहीं होता| हाँ, ज़्यादा छोटे बच्चों की मौज होती है, कभी ताऊ तो कभी नानी आइस-क्रीम अपने हाथों से खिला देते हैं| मगर, अगर जो बच्चा चलने लायक हो, तो समझिए उसके हाथ आइस-क्रीम बड़ी मशक्कत के बाद ही लगेगी| आइस-क्रीम वाले स्टाल के सामने भीड़ में खड़े बच्चे "भैय्या हमे भी, भैय्या हमे भी" करते रह जाते हैं| मगर भैय्या को हरी साड़ी वाली भाभी से फ़ुर्सत हो तब ना भैय्या सुनें! बिचारे कम लम्बाई वाले बच्चों का तो और भी बुरा हाल होता है| सबसे मुश्किल से आइस-क्रीम इन्हें ही मिलती है| आधे-पौन घंटे चिल्ल-पौ मचाने के बाद आखिरकार उनके हाथ आइस-क्रीम लग ही जाती है| मगर जंग अभी ख़त्म नहीं होती है दोस्तों...अभी मैदान-ए-जंग से सुरक्षित निकल के आना बाकी होता है| कुछ सिपाही निकल आते हैं और मेहनत का स्वाद पाते हैं, और कुछ शहीद हो जाते हैं चूँकि उनकी आइस-क्रीम, धक्का-मुक्की में नीचे जो गिर जाती है| उन बेचारे बच्चों को अंततः मीठी-ठंडी आइस-क्रीम के बजाये, गर्म-नमकीन आँसूं ही चाटने को मिलते हैं|